Naqaab Poetry Lyrics | Piyush Sharma | The Social House Poetry

This beautiful Poetry   'Naqaab' has written and performed by Piyush Sharma on The Social House's Plateform.

Naqaab

इश्क की जैसे सफेद पाक जुबानी होती है 
खैर के पीछे भी एक कहानी होती है 
कहानी में मिली थी जो एक लड़की कभी 
अब ढले दिन उसी पर एक कहानी होती है 
सुनो वो कुछ सवाल थे जो पूछने थे तुमसे
कुछ सवाल थे जो पूछने थे तुमसे
कुछ जवाब थे जो मांगने थे तुमसे 
या फिर नहीं अब, 
अब तुमसे मैं बातें ही किया करूं, 
वो बात नहीं तुम में 
जज्बातों को उतारू कागजों पर 
वो जज़्बात नहीं तुम में
वो नकाब कई सच झूठ के साथ लेकर चला करते हैं 
उन्हें हंसी है पसंद कोई, हम बेफिजूल उन्हें हंसाया करते हैं 
और अब देखने को भी मिल गया जो सुना करते थे कभी 
कि लोग अक्सर मन भर जाने पर नकाब बदला करते हैं
अरमां होते हैं जिन गुलों के 
वो खुद के बागों में कहां खिला करते हैं 
और चोट लगे अगर कांटो से 
तो गुलों पर नहीं जताया करते हैं 
दरअसल फितरत ही है गुलों की तो रहने में कांटों की 
तोड़ना भी खुद ने चाहा लोग खामखां गुलों को कोसा करते हैं 
कोसना ही है तो कोसों उन नकाब पोशो को
जो लोग अक्सर मन भर जाने पर नकाब बदला करते हैं 
खामियां भी जो पसंद आई कुछ सालों में 
उन्हें नापसंद कुछ दिनों में थोड़ी ही किया करते हैं 
हम जहां छोड़ कर उन पर और वो हमें छोड़ दो जहां पर ,ऐतबार किया करते हैं 
और फर्क भी कितने गिनाएं अब यहां पर 
हम वक्त निकालकर और वो वक्त निकालने में मिला करते हैं 
वो लोग भी कमाल किया करते हैं 
जो अक्सर मन भर जाने पर नकाब बदला करते हैं 
हमें भी कहां मिलनी है जन्नत यूं तो 
हम उनकी भी इनायत का उन्हीं पर गैर इस्तेमाल किया करते हैं 
जोड़ कर दो लफ्ज़ उन्हीं पर 
यू उन्ही की तौहीन किया करते हैं 
राज भी उन्हें तवज्जो आई
शख्स कहां उन्हें रास आया करते हैं 
और वो भी तो क्या खूब है 
जो मतलब से बेमतलब ही पास आया करते हैं 
पास आकर देखा जो वो चेहरा कहां दिखाया करते हैं 
क्योंकि वो लोग अक्सर मन भर जाने पर नकाब बदला करते हैं 
आखिर में बात करूं तो लगता है 
लगता है वो यही वजह से मेरी बातों में या कहीं मेरी यादों में 
लगता है कोई डोर अब भी उसे मुझसे कही जोड़े हुए है 
उस रुह को एक ख्वाब को या यूं कहूं कि महज एक नकाब को ।
                               – Piyush Sharma